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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

5:35 am

Khallari Mata Temple History in Hindi ( खल्लारी मंदिर का इतिहास)

Khallari Mata Temple History in Hindi ( खल्लारी मंदिर का इतिहास)


महासमुन्द से 25 किमी दक्षिण की ओर खल्लारी गांव की पहाड़ी के शीर्ष पर खल्लारी माता का मंदिर स्थित है। प्रतिवर्ष क्वांर एवं चैत्र नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ इस दुर्गम पहाड़ी में दर्शन के लिये आती है। हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा के अवसर पर वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत युग में पांडव अपनी यात्रा के दौरान इस पहाड़ी की चोटी पर आये थे, जिसका प्रमाण भीम के विशाल पदचिन्ह हैं जो इस पहाड़ी पर स्पष्ट दिख रहे हैं।


छत्तीसगढ़ के प्राचीन एवं ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है ‘खल्लारी’ इसका उल्लेख द्वापर युग से होता आ रहा है। द्वापर युग में हिडिम्ब नायक राक्षस का राज्य था जिसकी राजधानी सिरपुर थी हिडिम्ब ने एक वाटिका खल्लारी में बनवाया था जहां समय-समय में वह घुमने आता था इसी वाटिका के कारण इस स्थान का नाम खल्लवाटिका अर्थात राक्षस की वाटिका के रू में जाना जाता था हिडिम्ब की बाहन हिडिम्बनी थी जो अपने भाई के साथ वाटिका घुमने आती थी और इस स्थान में स्थित देवीशक्ति की पूजा अर्चना करती थी।



द्वापर युग में ही पांडव अपना राज्य छोड़कर 12 वर्ष का निर्वासन कर रहे थे इसी निर्वासनकाल में पांडव इस क्षेत्र से गुजरे महाराज धृटराष्ट के पुत्र दुर्योधन, शकुनी और अन्य कॉरवों ने मिलकर पांडवों की हत्या करने के लिए षड़यंत्र रचा था इस षडयंत्र के अंतर्गत उन सभी ने मिलकर लाख और मांश आदि से लाक्षागृह बनाया और उसमें आग लगा दी परंतु पाण्डव ने गुप्त मार्ग से निकलकर दक्षिण की ओर इसी जगह में भटकते-भटकते पहुंचे और स्वयं को सुरक्षित महसुस कर कुछ देर इसी जगह पहाड़ में विश्राम करने का निर्णय लिया तभी राक्षसों के राजा हिडिम्ब ने मनुष्य की गंध महसुस कर लिया जारा हिडिम्ब ने अपनी बहन हिडिम्बनी को बुलाया और उसे उन सभी मनुष्यों को अपने निवास स्थान तक लाने का काम सौंपा जब राक्षसी हिडिम्बनी पांडवों के पास पहुंची तो देखा कि सभी पांडव तो विश्राम कर रहे थे परंतु उनमें से एक जागकर पहरा दे रहा था वे पांडु पुत्र भीम थे राक्षसी हिडिम्बनी ने भी को देखते ही उन पर मंत्र मुग्ध हो गई और उनसे प्रेम करने लगी और सुंदर सा रूप धारण कर उनके समीप जाकर उसे विवाह करने का प्रस्ताव रखी परंतु हिडिम्बनी को अपने भाई के समान ही अत्यंत बल शाली वर चाहिये था इस के लिए उसने भीम की परीक्षा ली और भीम ने अपनी वीरता का परिचय खल्लारी पहाड़ी के ऊपर चट्टान में दिया, भीम ने अपना पैर चट्टान पर पुरी शक्ति के साथ दबाया जहां-जहां पैर पर बल दिया गयसा वहां-वहां उसका पैर चट्टान पर धस गया।


इस दृश्य को देखकर हिडिम्बनी प्रसन्न हो गई इधर हिडिम्ब देर होने के कारण अपनी बहन को ढूंडते-ढूंडते वहां पर पहुंचा तो देखा कि उसकी बहन पांडव के साथ है। परंतु जैसे ही पता चला कि हिडिम्बनी भी से प्रेम करने लगी है और उससे विवाह करना चाहती है तो हिडिम्ब क्रोधित होकर भीम को युद्ध के लिए ललकारा तब भीम और हिडिम्ब के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में भीम ने हिडिम्ब का वध कर दिया और फिर भीम और हिडिम्बनी का गंधर्व विवाह देवी के समक्ष हुआ एक वर्ष में ही हिडिम्बनी और भीम का पुत्र का जन्म हुआ उत्पन्न होने समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच (घट+उत्कच) रखा गया वह अत्यंत मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया और फिर हिडिम्बनी अपने पुत्र को पांडवों को सौंपकर वह हिमाचल प्रदेश (मनाली) में चली गई और वहां उसका दैवीकरण हुआ और आज भी वहां हिडिम्बनी देवी के रूप में स्थित है।



आज भी खल्लारी पहाड़ में भीम से संबंधित अनेक चीजें देखने को मिलती है जैसे भी पांव(निशान), भीम चुल्हा, भीम खोह, भीम का हंडा आदि यह बातें यह प्रमाणित करता है कि भीम और हिडिम्बनी के विवाह और घटोत्कच के जन्म से संबंधित कुछ न कुछ सत्यता इसी पहाड़ों के जंगल में मिलती है। महाभारत में इन प्रणय का प्रमाण उपलब्ध है।



वर्तमान युग में खल्लारी का उल्लेख 15वीं सदी से ज्ञात होता है जब रतनपुर राज्य दो भागों में बंट गया एक ही राजधानी रतनपुर और दूसरे की राजधानी रायपुर में स्थापित कि गई थी दोनों राज्यों में 18-18 गढ़ थे खल्लारी भी रायपुर राज्य का एक गढ़ था खल्लारी के अंतर्गत 84 ग्राम शासित होते थे रायपुर के शासक ब्रह्मदेव का एक शिलालेख विक्रम संवत 1471 (19 जनवरी सन 1415) खल्लारी में प्राप्त हुआ हैइस शिलालेख से ज्ञात होता है कि हैहयवंश कि कलचुरी नामक शाखा में राजा सिंघण के बेटे रामचंद्र ने नागवंश के भोडिंगदेव को युद्ध में घायल किया था रामचंद्र का पुत्र ब्रह्मदेव था जो शिव जी का भक्त था शिलालेख में अंकित है कि वह योद्धाओं के लिए यम के समान, याचकों के लिए कल्पवृक्ष के समान था इस शिलालेख के सांतवे और आठवें श्लोक में खल्ल वाटिका नगरी के वर्णन में लिया गया है कि शुभ देवालय कि स्थापना वेदाध्ययन सुखी ब्राह्मण का वास, लक्ष्मी के विलास से धनी लोगों का वास इत्यादि का वर्णन मिलता है नौवे श्लोक में मोची देवपाल की वंशावली एवं दसवें श्लोक में उनके द्वारा नारायण का मंदिर निर्मित कराये जाने का उल्लेख मिलता है।




रायपुर राज के कुछ समय के लिए अंशाति फैल गई फलस्वरूप कलचुरी शाक वे खल्लारी को अपनी राजधानी बनाई और इसे वाटिकाओं से सुशोभीत कराए जाने का उल्लेख मिलता है। खल्लारी में प्राप्त शिलालेख के आधार पर देवपाल मोची का वर्णन मिलता है जो किर्तीवान था अपने कार्य में दक्ष था ब्राह्मणी का अनुचर जैसा था विभिन्न धर्म कायो का अभिलााषी था उसने अपनी शक्ति के अनुसार महान भक्ति सो नारायण (भगवाान विष्णु) का मण्डप युक्त मंदिर खल्लारी में बनवााया था मोची द्वारा मंदिर निर्माण्एा देश के इतिहास में भावात्मक एवं साामुदायिक एकता का एक अनुठा प्रमाणिक उदाहरण है।



जहां न केवल एक मोची को मंदिर बनवाने का अधिकार था बल्कि उसो इसा कार्य में राजा के साथ-सााथ ब्राह्मणों एवं कायस्थ जैसी जातियों का सहयोग भी प्राप्त था शिलालेख में मां भगवती की पूजा का भी उल्लेख मिलता है। खल्लारी में कल्चुरी शासकों के कार्यकाल के एक किलो का अवशेष भी दिखाई देता है गांव में अनेक नक्काशीदार पत्थर के स्तंभ भी पाए गए है। खल्लारी में एक प्राचीन मंडपनुमा खंडहर है जिसे लोग ‘लखेसारी’ गुडी का नाम देते है यहां तालाबों और पोखरों कि संख्या बहुत अधिक है। यहां 126 तालाबों का दस्तावेज भी प्राप्त है यह सभीी बातें खल्लारी की प्राचीनता का प्रमाण देते है।



रायपुर और रतनपुर के कुल्चुरी शासकों पर मराठों का अधिपत्य हो जाने के बाद खल्लारी का इतिहासा अंधकारमय हो जाता है। परंतु प्राचीन परिपाटी के अनुसाार मां खल्लारी की पूजा अर्चना में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आया जो निरंतर जारी है।



खल्लारी को कालांतर में खल्लवाटिका के नाम से जाना जाता रहां खल्लारी का एक मतलब खल्ल+अरी अर्थात दुष्टों का नाश करने वाली होता है संभवतया इसी कारण देवी माता का नाम खल्लारी हुआ ऐसा मानना है कि यहां का बाजार (हाट) काफी प्रसिद्ध था देवी मां नवायुवती का रूप धारण कर बेमचा (महासमुंद) सो यहां हाट में आया करती थी मां के इस लाावण्य रूप को देखकर एक बंजारा उन पर मोहित हो गया और मां का पिछा करने लगा बार-बार चेतावानी के बाद भी जब वह नहीं माना तब देवाी ने उसो श्राप देकर पत्थर का बना दिया जो आज भी गोड पत्थर के नाम से जाना जाता है।




इधर खल्लारी माता ने पाषाण रूप धारण कर पहाड़ को अपना निवास बना लिया और यहां के ग्रामीण को सपना देकर कहा कि मैं यहां के पहाड़Þी में पत्थरों के बीच निवाास हूं। प्रकाश पूंज निकल रहा है। तब उस ग्रामीण व्यक्ति ने ग्रामवासियों के साथ उस स्थान पर गए तो वाहां देखा कि मां के पाषाण रूप में उनकी ऊंगली स्वष्ट रूप से दिखाई दे रहां था तब से ग्रामवासियों ने वहां पूजा अर्चना प्रारंभ किया जो आज भी निरंतर जारी है।



क्षेत्र के लोग मां खल्लारी को अपना रक्षक मानते है प्राकृतिक विपदा के पूर्व माता पहाड़ी सो आवाज देकर पूजारी को सजग कर दिया करती थी।


खल्लारी के विकास की गाथा


प्रारंभिक चरण में खल्लारी पहाड़ी के ऊपर कोई मंदिर नहीं था केवल एक खोह था जहां पर माता की ऊंगली का निशान था और उसी की पूजा अर्चना कि जाती थी दर्शनार्थियों की कठिनाईयों को देखते हुए महासमुंद पदस्थ तहसीलदार दुर्गाप्रसाद एवं हरिदास मेहता के सहयोग से सन 1940 में 481 सीढ़ियों का निर्माण कराया गया श्री दुर्गा प्रसाद वे माता के खोह की जगह एक छोटा सा मंदिर बनवाया जिसमें ठीक से आने-जाने की जगह नहीं थी इसी कमी को ट्रस्ट पूर्व अध्यक्ष श्री जयलाल प्रसाद चंद्राकर द्वारा अपने कार्यकाल (1965-70) में दूर कर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था खल्लारी के पूर्व विधायक मध्यप्रदेश शासन के पूर्व मंत्री लक्ष्मीनारायण इंदुरिया ने अपने कार्यकाल में खल्लारी पहाडी पर विद्युत व्यवस्था का कार्य (1984-85) में कराया इस व्यवस्था में मां खल्लारी की भव्यता में चार चांद लग गया।



श्री इंदुरिया जी ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक दिव्य बसेरा का भी निर्माण कराया है वास्तव में श्री इंदुरिया ही प्रगति के सोपान रखने वाले पहले राजनेता है। पहाड़ी के ऊपर दर्शनार्थियों को पीने के लिाए पानी की अति आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति ट्रस्ट कमेटी द्वारा अपने संसाधन सो किया जाती रही इस कमी को दूर करने का प्रयास सांसद श्री पवन दीवन जी, पूर्व विधायक श्री भेखराम साहू जी एवं पूर्व रायपुर के जिलाधीश श्री डीपी तिवारी जी के संयुक्त प्रयास से पाइप लाईन बिछाकर पहाड़ी ऊपर निरंतर जला आपूर्ति का महती कार्य किया गया जल आपूर्ति में कालांतर में उत्पन्न हुई कठिनाईयों को क्षेत्र के पूर्व सांसद श्री चंद्रशेखर साहू जी ने पंप सेट और जनरेटर किया व्यवस्था कराकर दूर किया।




पहाड़ के नीचे माता राऊर (स्थल)मंदिर की स्थापना माता के आदेशानुसार करायी गई बताया जाता है दुर्गम पहाड़ी पर रास्ता सुगम नहीं होने के कारण बुजुर्गों एवं नि:शक्त जनों के मां के दर्शन के लिए तकलीफों का सामना करना पड़ता था माता ने यहां के माल गुजार गड़ाऊ गौठिया को माता न सपने में आदेश दिया कि मेरे द्वारा फेकी जा रही कटार जहां गिरेगी हां मुर्ति की स्थापना कि जाए जो भक्त पहाड़ी पर नहीं चढ़ पायेगे उन्हें नीचे पूजा व दर्शन से पहाड़ी की भांति पुण्य लाभ प्राप्त हो सकेगा। गड़ाऊ गौठिया ने माता के आदेशानुसार नीचे मंदिर बनवाया जहां कटार गिरी थी चंद्रभान अग्रवाल द्वारा प्रदान कि गई। इस मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्य प्रगति पर है।

मंदिर ट्रस्ट द्वारा यात्रियों की सुविधा को देखते हुए रोपवे की मांग निरंतर ट्रस्ट द्वारा छत्तीसगढ़ शासन से किया जा रहा है।



मनोकामना ज्योति प्रज्जवलित के संबंध में

सन् 1985 में सर्वप्रथम नवरात्रि मे ज्योति कलश प्रज्जलित करना प्रारंभ हुआ जिनकी संख्या 11 है। धीरे-धीरे इसकी संख्या में वृद्धि हुई और आज हजारों की संख्या में यहां मनोकामनाएं ज्योति प्रज्जवलित किया जाता है।


खल्लारी में अन्य दशर्निय स्थल


माता के दर्शन के बाद परिक्रमा के साथ गुफा में मां दंतेश्वरी के अलावा अनेक ऐसे दर्शन होते है जिसे महाभारत काल के पाण्डवों के बनवास से जुड़ा होना मानते है ऐसा माना जाता है यहां पत्थर पर भीम के पांव का निशान, भीम चुल्हा आदि देखा जा सकता है।



यहा कि अधिकांश बाते भीम से जुडी हुई मिलती है जिसमें चमत्कृत कर देने वाली प्रकृति की रचना नाव के आकार का विशाल पत्थर विशेष उल्लेखनीय है। जिसे भीम की नांव भी कहा जाता है। सैकड़ों टन वजनी यह पत्थर पहाड़ी के एक ऐसे किनारे पर स्थित है जिसका आधा भाग सैकड़ों फीट गहरायी कि ओर है। यह विशालकाय शिला एक छोटे से पत्थर पर अपना अनूठा संतुलन प्रस्तुत कर दर्शकों को प्रकृति के आगे नमन करने को बाध्य कर देता है। इसे देखने मात्र से लगता है कि थोडे धक्के से पत्थर सैकड़ों फुट नीचे जा गिरेगा किंतु हजारों साल यह अपने अनुठे संतुलन का अनवरत परिचय दे रहा है।



5:06 am

छत्तीसगढ़ का कश्मीर-चैतुरगढ़ किला

छत्तीसगढ़ का कश्मीर-चैतुरगढ़। Chaiturgarh fort


Hello! दोस्तों आपने ताज महल के बारे में तो बहोत सुना होगा इसे लोग “छत्तीसगढ़ का कश्मीर” के नाम से प्रशिद्ध  चैतुरगढ़ किले कहते है जो छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित हैं।


चैतुरगढ़ (लाफागढ़) कोरबा शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित है। यह पाली से 25 किलोमीटर उत्तर की ओर 3060 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है, यह राजा पृथ्वीदेव प्रथम द्वारा बनाया गया था। पुरातत्वविदों ने इसे मजबूत प्राकृतिक किलो में शामिल किया गया है, चूंकि यह चारों ओर से मजबूत प्राकृतिक दीवारों से संरक्षित है केवल कुछ स्थानों पर उच्च दीवारों का निर्माण किया गया है।किले के तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं जो मेनका, हुमकारा और सिम्हाद्वार नाम से जाना जाता है।

पहाड़ी के शीर्ष पर 5 वर्ग मीटर का एक समतल क्षेत्र है, जहां पांच तालाब हैं इनमें से तीन तालाब में पानी भरा है।यहां प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर स्थित है। महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति, 12 हाथों की मूर्ति, गर्भगृह में स्थापित होती है। मंदिर से 3 किमी दूर शंकर की गुफा स्थित है। यह गुफा जो एक सुरंग की तरह है, 25 फीट लंबा है। कोई गुफा के अंदर ही जा सकता है क्योंकि यह व्यास में बहुत कम है।




चित्तौड़गढ़ की पहाड़ी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं और यह रोमांचक एह्साह का अनुभव प्रदान करती है।कई प्रकार के जंगली जानवर और पक्षी यहां पाए जाते हैं।एसईसीएल ने यहां देखने आने वाले पर्यटनो के लिए एक आराम घर का निर्माण किया है।मंदिर के ट्रस्ट ने पर्यटकों के लिए कुछ कमरे भी बनाये।

नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष पूजा आयोजित की जाती है।


ऐतिहासिक दृष्टि से चैतुरगढ़ किले को बहुत ही महत्व प्राप्त है। पुरातत्वविद इस किले को एक प्राकृतिक और मजबूत किला मानते है। कुछ का ऐसा भी मानना है मध्य प्रान्त और बेरार में मिले कुछ शिलालेख बताते है यह किला 933 कलचुरी के ज़माने का है और उस वक्त कलचुरी राजा का शासन था।




ऐसा माना जाता है की यहाँ का राजा हैहाया परिवार का था और उसे अठरा लड़के थे। उस राजा के लडको में से एक का नाम कलिंगा था और उस कलिंगा का लड़का कमला राजा था। कमला राजा ने तुम्मना पर कई सालो तक शासन किया था। लेकिन कमला राजा को रत्नराजा  ने हराया था।


लेकिन रत्नराजा के बाद पृथ्वीदेव ने शासन किया। ऐसा कहा जाता है की इस किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव ने करवाया था। भारत का पुरातत्व विभाग इस किले की देखभाल का काम देखता है।


चैतुरगढ़ किले की वास्तुकला – Chaiturgarh fort Architecture




प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर भी यहीपर है। यहाँ के मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की 12 हातोवाली मूर्ति स्थापित की गयी है। इस मंदिर से 3 किमी की दुरी पर शंकर गुफा है। यह गुफा एक सुरंग की तरह है जो की 25 फूट की है। इस गुफा का आकार बहुत छोटा होने के कारण इसमें से रेंगते हुए ही जाना पड़ता है।


इस चैतुरगढ़ या लाफागढ़ किले की दीवारे एक तरह से ने ना होने के कारण हमें इसकी दीवारे कई जगह पर छोटी तो कई जगह पर मोटी देखने को मिलती है। किले के प्रवेश द्वार बहुत ही खुबसूरत तरीक़े से बनाया गया है। इसमें कई सारे स्तंभ और मुर्तिया भी देखने को मिलती है।


यहापर एक बहुत बड़ी गुबंद है जो मजबूत स्थम्भो पर बनायीं गयी है। इस गुबंद को आधार देने के लिए पाच स्तंभ बनवाये गए थे।


किले के बाजु में जो पहाड़ी है उसके आजूबाजू में पाच तालाब थे जो की करीब 5 वर्ग किमी में फैले हुए थे। उन पाच तालाबो में से तीनतालाब साल भर पानी से भरे रहते थे।


किले को मेनका, हुम्कारा और सिंहद्वार नामके तीन सबसे अहम द्वार माने जाते है।




बहुत सारे किले को एक ही नाम दिया जाता है। लेकिन चैतुरगढ़ के किले को एक नहीं बल्कि दो नाम दिए गए है। और यही इस किले की खासियत है। इस किले को चैतुरगढ़ के साथ साथ लाफागढ़ किला नाम से भी जाना जाता है।


और सबसे बड़ी और चौकाने वाली बात यह है की यह किला इतना उचाई पर होने के बाद इसके सबसे ऊपर के इलाके में एक नहीं बल्की पुरे पाच तालाब है और उनमेसे ज्यादातर तालाबो में साल भर पानी भरा रहता है।


अन्य जानकारी -    चैतुरगढ़ का क्षेत्र अलौकिक होने के साथ ही काफ़ी दुर्गम भी है। गुप्त गुफ़ा, झरना, नदी, जलाशय, दिव्य जड़ी-बूटी तथा औषधीय वृक्षों से यह क्षेत्र परिपूर्ण है।



गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

9:47 pm

सत्यनारायण बाबा कोसमनारा रायगढ़ | Raigarh Ka Baba Satyanarayan Kosamnara (हठयोगी)

सत्यनारायण बाबा कोसमनारा रायगढ़ | Raigarh Ka Baba Satyanarayan Kosamnara (हठयोगी)



यह कहानी छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के देवरी-डूमरपाली गांव के बाबा सत्यनारायण से जुड़ी है। बाबा सिर्फ इशारे में बात करते हैं। कहते हैं कि वे समाज की भलाई के लिए यह कठोर तपस्या कर रहे हैं। भक्ति और अंधविश्वास..दोनों में बारीक फर्क होता है। लोगों की भलाई..प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेकर भगवान की साधना करना भक्ति है..जबकि इसके उलट अपने स्वार्थ के लिए लोगों को भ्रमित करना अंधविश्वास। यह बाबा भक्ति का उदाहरण हैं। हठ योगी सत्यनाराण बाबा पिछले 22 सालों से एक ही जगह पर बैठकर तपस्या में लीन हैं। दैनिक क्रियाओं आदि को छोड़कर हमेशा वे उसी चबूतरे पर बैठे रहते हैं। यह जगह अब धीरे-धीरे धार्मिक स्थल का रूप ले चुकी है। यह जगह है रायगढ़ से 6 किमी दूर है। सत्यनारायण बाबा 16 फरवरी, 1998 से यहां तपस्या कर रहे हैं।  वे कोई भी मौसम हो..सर्दी-गर्मी या बारिश..कभी तपस्या अधूरी नहीं छोड़ते।


बाबा का जन्म रायगढ़ जिले के कोसमनारा से करीब 19 दूर देवरी-डूमरपाली में एक गरीब किसान दयानिधि साहू और हंसमती के घर 12 जुलाई, 1984 को हुआ था।

बताते हैं कि जब बाबा की उम्र 14 साल की थी, एक दिन स्कूल जाते समय उनके दिमाग में पता नहीं क्या आया कि वे रायगढ़ की तरफ निकल पड़े। इस तरह वे अपने गांव से 19 किमी दूर कोसमनारा जा पहुंचे। फिर वहीं के होकर रह गए।


बताते हैं कि जब बाबा की उम्र 14 साल की थी, एक दिन स्कूल जाते समय उनके दिमाग में पता नहीं क्या आया कि वे रायगढ़ की तरफ निकल पड़े। इस तरह वे अपने गांव से 19 किमी दूर कोसमनारा जा पहुंचे। फिर वहीं के होकर रह गए।बताते हैं कि बाबा शिवजी के भक्त हैं। यहां आकर उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की। फिर पूरा जीवन शिवजी को समर्पित कर दिया।बताते हैं कि बाबा शिवजी के भक्त हैं। यहां आकर उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की। फिर पूरा जीवन शिवजी को समर्पित कर दिया।


बाबा के बचपन का नाम हलधर था। लेकिन पिता उन्हें सत्यनारायण कहकर पुकारने लगे थे। गांववाले बताते हैं कि बचपन से ही बाबा शिवजी के भक्त थे। उन्होंने बचपन में 7 दिनों तक शिवजी की तपस्या की थी।

बाबा के बचपन का नाम हलधर था। लेकिन पिता उन्हें सत्यनारायण कहकर पुकारने लगे थे। गांववाले बताते हैं कि बचपन से ही बाबा शिवजी के भक्त थे। उन्होंने बचपन में 7 दिनों तक शिवजी की तपस्या की थी।

इस जगह पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। लोगों का कहना है कि बाबा किसी से कुछ नहीं लेते। वे समाज की भलाई और पर्यावरण आदि के संरक्षण के लिए यह तपस्या कर रहे हैं।



इस जगह पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। लोगों का कहना है कि बाबा किसी से कुछ नहीं लेते। वे समाज की भलाई और पर्यावरण आदि के संरक्षण के लिए यह तपस्या कर रहे हैं।


बाबा से जुड़ी मान्यता - लोगों की मान्यता है कि बाबा किसी से बात नहीं करते, जरूरत के मुताबिक इशारों से ही समझाते हैं. हर मौसम में बाबा खुले आसमान के नीचे बैठे रहते हैं. स्थानिय निवासी मुकेश शर्मा का कहन है कि लोग सत्यनारायण बाबा को अवतारी भी मानते हैं. यहां हर साल लाखों लोग बाबा के दर्शन करने आते हैं. सावन  हो या शिवरात्रि यहां भक्तों का तांता लगा रहता है.



विज्ञान को चुनौती - आर्थो सर्जन डॉ. सुरेन्द्र शुक्ला का कहना है कि एक ही स्थान पर एक ही मुद्रा में इस तरह बैठना काफी खतरनाक हो सकता है. इसमें कई तरह के कॉम्पलिकेशन आ सकता है. लोग इन्हें हठयोग भी कहते हैं मगर जानकारों की मानें तो यह विज्ञान के लिए भी चुनौती है, क्योकि एक ही स्थान पर बैठे रहना, कुछ समय उठन,  फिर वापस बैठे रहना, संयमित भोजना और हर मौसम में चंद कपड़ों में रहना विज्ञान को चुनौती देने जैसा है.

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

2:16 am

छत्तीसगढ का खजुराहो भोरमदेव मंदिर | Bhoram Dev Mandir

           छत्तीसगढ का खजुराहो  भोरमदेव मंदिर।


Hello! दोस्तो आज हम एक ऐसे सुंदरता के बारे में बात करने जा रहे है जिसे देखने लोग दूर दूर से आते है । छत्तीसगढ़ राज्य के खजुराहो कहे जाने वाले  भोरमदेव मंदिर का जोकि जनजातीय संस्‍कृति, स्‍थापत्‍य कला और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। इस दृश्य को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते है।

                                  छत्तीसगढ़ का खजुराहो |


भारत का हर एक राज्य अपनी किसी न किसी खास चीज के लिए प्रसिद्ध है. इसी कड़ी में अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो वहां का भोरमदेव मंदिर खासा आकर्षण का केंद्र रहा है, जोकि जनजातीय संस्‍कृति, स्‍थापत्‍य कला और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है.चूंकि, भोरमदेव के मंदिर की तुलना मध्य प्रदेश के खजुराहो और ओडिशा के सूर्य मंदिर से की जाती है. ऐसे में इसको जानना दिलचस्प रहेगा। भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ के कबीरधाम जिले में कबीरधाम से 18 कि॰मी॰ दूर तथा रायपुर से 125 कि॰मी॰ दूर चौरागाँव में एक हजार वर्ष पुराना मंदिर है।

        Chilphi ghati | 

            मंदिर का मुख पूर्व की ओर है। मंदिर नागर शैली का एक सुन्दर उदाहरण है। मंदिर में तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है। मंदिर एक पाँच फुट ऊंचे चबुतरे पर बनाया गया है। तीनो प्रवेश द्वारो से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश किया जा सकता है। मंडप की लंबाई 60 फुट है और चौडाई 40 फुट है। मंडप के बीच में में 4 खंबे है तथा किनारे की ओर 12 खम्बे है जिन्होने मंदप की छत को संभाल रखा है। सभी खंबे बहुत ही सुंदर एवं कलात्मक है। प्रत्येक खंबे पर कीचन बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में अनेक मुर्तियां रखी है तथा इन सबके बीच में एक काले पत्थर से बना हुआ शिवलिंग स्थापित है।

 मंदिर के चारो ओर बाहरी दीवारो पर विश्नु, शिव चामुंडा तथा गणेश आदि की मुर्तियां लगी है। इसके साथ ही लक्ष्मी विश्नु एवं वामन अवतार की मुर्ति भी दीवार पर लगी हुई है। देवी सरस्वती की मुर्ति तथा शिव की अर्धनारिश्वर की मुर्ति भी यहां लगी हुई है

मंदिर की कलाकृति


छत्तीसगढ़ का भोरमदेव, जहाँ कामकला में सराबोर मूर्तिया बरबस ही इंसान को हजारों साल पहले के भारत में ले जाती हैं. भोरमदेव मंदिर की मान्यता सिर्फ इसलिए नहीं की वह एक मंदिर है और वहां शिवजी भोरमदेव के रूप में विराजते हैं.

इससे बढ़कर इसकी मान्यता इसलिए भी है, क्योंकि इसका धार्मिक और पुरातात्विक महत्त्व भी है. भोरमदेव का मंदिर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के गृहग्राम कवर्धा जिले से मात्र से 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है. इसके पूर्व की में मैकल पर्वत श्रृंखलाएं, जो इसे और भी सुरम्य बनाती हैं.

कवर्धा एक छोटा सा जिला है, जो अपने में किसी बड़े शहर के मानिंद खूबसूरती समेटे है. इसी कवर्धा से भोरमदेव मंदिर का रास्ता है, जो हराभरा और शांत है. धीरे-धीरे घने होते वन और उनके बीच सिमटता मंदिर सच में स्वर्ग का अहसास करवाता है.

भगवान शिव का बसेरा


मड़वा महल

भोरमदेव के बारे में मान्यता है कि वह शिव के ही एक अन्‍य रूप हैं, जो गोंड समुदाय के पूजनीय देव थे. इन्ही भोरमदेव के नाम से इस मंदिर का निर्माण हुआ. इसके आस पास और भी देवताओं जैसे वैष्‍णव, बौद्ध और जैन प्रतिमाएं भी हैं.

किन्तु, शिव के मंदिर की भव्यता यह साबित करने के लिए काफी है कि इस मंदिर के निर्माता नागवंशी शासक शिव के परम भक्त थे. शायद यही कारण है कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. भगवान शिव यहां भी शिवलिंग रूप में विराजमान हैं.

मुख्य मंदिर दो भागों में विभाजित है. इसके बड़े भाग यानि मुख मंडप में शिवलिंग है , जो एक ऊँचे मंच पर स्थित है. यहाँ शिवलिंग पूर्व मुखी है. शिव के अलावा भगवान विष्णु और उनके कई अवतार जैसे नरसिंह, वामन, नटराज,  कृष्ण आदि की मूर्तिया हैं. साथ ही भगवान गणेश, काल भैरव और सूर्य भी यहां देखने को मिलते हैं.


गढ़ो का राज्य 



कहा जाता है कि अपने छत्‍तीसगढ़ गढ़ों यानि किलों के कारण छत्तीसगढ़ का नाम पड़ा. स्‍थापत्‍य कला के अनेक उदाहरण आपको यहाँ देखने को मिल जाएंगे. किन्तु, भोरमदेव की स्थापत्य कला उन सबसे जुदा है.

इस मंदिर का सौंदर्य आपको खजुराहो, अन्जनता एलोरा और कोणार्क की याद दिलाता है. यही कारण है कि बोलचाल की भाषा ने इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहों भी कह दिया जाता है. यहां की कामुक मुद्रा वाली मूर्तियां, जो यकीनन काफी सुंदर हैं.

इस मंदिर में बाहर की ओर 54 की संख्या में मूर्तियाँ है, जो कामसूत्र के विभिन्न आसनों से प्रेरित हैं. कई लोग इसको शाश्वत प्रेम और सुंदरता का प्रतीक मानते हैं, तो कई इनकी कला को देखकर अभिभूत होते हैं. इस मंदिर के आधार पर नागवंशी शासकों को खजुराहो के शासकों के समकालीन माना जा सकता है.

मंदिर में जो भी निर्माण कार्य है किए गए है, उन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे मानो वह खजुराहो से प्रेरित हैं. हालांकि, यह कितना सच यह कुछ नहीं कहा जा सकता।


यह मंदिर 11 शताब्दी के आसपास बना कला का बेहतरीन का नमूना हैं. अगर शैली की बात की जाए, तो इसके हर भाग में कलाकृतियां बारीकी से उकेरी गयी हैं.मंदिर में सिर्फ कामुक मूर्तियाँ ही नहीं, बल्कि उस काल का पूरा जीवन दिखता है.

सम्भोग तो है पर साथ ही नाच, गाना, भक्ति और वो सब मुद्राएं हैं, जो खुशहाल जीवन का प्रतीक होती हैं. नाचते गाते आदिवासी उस काल के जीवन-दर्शन को दिखाते हैं, जहां कोई भेदभाव भाव नहीं था. सब साथ मिलकर नाच गाकर उत्सव मानते दिखते हैं.


प्रेम उत्सव! दीवारे भक्ति का प्रतीक


हर दीवार और स्तम्भ में लोग बस एक ही काम में व्यस्त हैं और वो है प्रेम क्रीड़ा. स्त्री-पुरुष के परम प्रेम की परिणिति काम-क्रीडा को परिलक्षित करती. वहीं यहाँ की दीवारें मानों कह रही हों कि प्रेम और प्रेम अहसास बस यहीं है यहाँ की मूर्तियों में.

भोरमदेव मंदिर की स्‍थापत्‍य चंदेल शैली है. खजुराहो और कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान यहाँ भी मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन समानांतर क्रम में विभिन्‍न प्रतिमाओं को उकेरा गया है, जिनमें से प्रमुख रूप से शिव की

तो दोस्तो ये थी छत्तीसगढ़ की सुंदरता का एक रूप आशा करता हु की आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी और आगे आप यह जाने का प्लान बनाएंगे यह कि खूबसूरती का मजा उठाने और अगर ये जानकारी आपको अच्छी लगी तो like👍 और comment जरूर कीजिये ताकि आगे हुम् इशी तरह नई-नई जानकारियाँ आपके लिए लाते रहे।

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